शिवमहिम्न स्तोत्र | Shiv Mahimna Stotram with Hindi Meaning
शिवमहिम्न स्तोत्र भगवान शिव की महिमा का वर्णन करने वाला एक प्रसिद्ध स्तोत्र है। इसकी रचना गंधर्व पुष्पदंत ने की थी। यह स्तोत्र भगवान शिव की अनंत शक्ति, महिमा और करुणा का वर्णन करता है।
शिवमहिम्न स्तोत्र – 43 श्लोक (अर्थ सहित)
श्लोक 1
महिम्नः पारं ते परमविदुषो यद्यसदृशी
स्तुतिर्ब्रह्मादीनामपि तदवसन्नास्त्वयि गिरः।
अथावाच्यः सर्वः स्वमतिपरिणामावधि गृणन्
ममाप्येष स्तोत्रे हर निरपवादः परिकरः॥
अर्थ:
हे भगवान शिव! आपकी महिमा अनंत है। ब्रह्मा और विष्णु जैसे देवता भी आपकी पूरी स्तुति नहीं कर सकते।
श्लोक 2
अतीतः पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः
अतद्व्यावृत्त्या यं चकितमभिधत्ते श्रुतिरपि।
स कस्य स्तोतव्यः कति विधगुणः कस्य विषयः
पदे त्वर्वाचीने पतति न मनः कस्य न वचः॥
अर्थ:
आपकी महिमा वाणी और मन की सीमा से परे है। वेद भी इसे पूर्ण रूप से नहीं बता पाते।
श्लोक 3
मधुस्फीता वाचा परममृतं निर्मितवता
तव ब्रह्मन् किं वागपि सुरगुरोर्विस्मयपदम्।
मम त्वेतां वाणीं गुणकथनपुण्येन भवतः
पुनामीत्यर्थेऽस्मिन् पुरमथन बुद्धिर्व्यवसिता॥
अर्थ:
हे शिव! आपकी महिमा का वर्णन करते हुए देवताओं की वाणी भी आश्चर्यचकित हो जाती है।
श्लोक 4
तवैश्वर्यं यत्तज्जगदुदयरक्षाप्रलयकृत्
त्रयीवस्तु व्यस्तं तिसृषु गुणभिन्नासु तनुषु।
अभव्यानामस्मिन् वरद रमणीयामरमणीं
विहन्तुं व्याक्रोशीं विदधति इह केचिज्जडधियः॥
अर्थ:
सृष्टि का निर्माण, पालन और संहार सब आपकी शक्ति से ही होता है।
श्लोक 5
किमीहः किंकायः स खलु किमुपायस्त्रिभुवनं
किमाधारो धाता सृजति किमुपादान इति च।
अतर्क्यैश्वर्ये त्वय्यनवसरदुःस्थो हतधियः
कुतर्कोऽयं कांश्चिन्मुखरयति मोहाय जगतः॥
अर्थ:
आपकी शक्ति इतनी महान है कि लोग उसकी कल्पना भी नहीं कर सकते।
श्लोक 6
अजन्त्रं त्वां शम्भो जगदिदमनेकार्थविभवं
समाधातुं शक्नोति क इह जगदीश त्वदन्यः।
अर्थ:
हे शम्भु! इस पूरे संसार को व्यवस्थित रखने की शक्ति केवल आपके पास है।
श्लोक 7
त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति
प्रभिन्ना भिन्ना मार्गाः प्रथयितुमनुयान्ति।
अर्थ:
धर्म के अलग-अलग मार्ग हैं, लेकिन सभी का लक्ष्य भगवान शिव ही हैं।
श्लोक 8
महाक्षः खट्वाङ्गं परशुरजिनं भस्म फणिनः
कपालं चेतीयत्तव वरद तन्त्रोपकरणम्।
अर्थ:
शिवजी के पास जो वस्तुएँ हैं वे साधारण दिखती हैं, परंतु उनका महत्व बहुत महान है।
श्लोक 9
ध्रुवं कश्चित्सर्वं सकलमपरस्त्वध्रुवमिदं
परो ध्रौव्याध्रौव्ये जगति गदति व्यस्तविषये।
अर्थ:
कुछ लोग संसार को स्थायी मानते हैं और कुछ अस्थायी, परंतु सत्य केवल भगवान शिव जानते हैं।
श्लोक 10
तवैश्वर्यं यत्नाद्यदुपरि विरिञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेत्तुं यातौ अनलमनलस्कन्धवपुषः।
अर्थ:
ब्रह्मा और विष्णु ने भी आपकी सीमा जानने का प्रयास किया, पर सफल नहीं हुए।
श्लोक 11
अयत्नादापाद्य त्रिभुवनमवैरव्यतिकरं
दशास्यो यद्बाहूनभृत रणकण्डूपरवशान्।
अर्थ:
रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी।
श्लोक 12
अमुश्य त्वत्सेवा समधिगतसारं भुजवनं
बलात्कैलासेऽपि त्वदधिवसतौ विक्रमयतः।
अर्थ:
रावण ने आपकी भक्ति से ही महान शक्ति प्राप्त की थी।
श्लोक 13
यदृद्धिं सुतरामपि बलवतामपि त्वदन्ये
न सेहेते तस्य त्वमसि शरणं शम्भो।
अर्थ:
आपकी शरण में आने वाला भक्त कभी पराजित नहीं होता।
श्लोक 14
अकाण्डब्रह्माण्डक्षयचकितदेवासुरकृपा
विधेयस्यासीद्यस्त्रिनयन विषं संहृतवतः।
अर्थ:
समुद्र मंथन के समय विष को पीकर आपने संसार की रक्षा की।
श्लोक 15
असिद्धार्था नैव क्वचिदपि सदेवासुरनरे
निवर्तन्ते नित्यं जगति जयिनो यस्य विशिखाः।
अर्थ:
कामदेव ने भी शिवजी पर अपने बाण चलाने का प्रयास किया था।
श्लोक 16
मही पादाघाताद्व्रजति सहसा संशयपदं
पदं विष्णोर्भ्रान्त्या भुजपरिघरुग्णग्रहगणम्।
अर्थ:
भगवान शिव के नृत्य से संपूर्ण ब्रह्मांड प्रभावित होता है।
श्लोक 17
वियद्व्यापी तारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः
प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते।
अर्थ:
गंगा जी शिवजी के जटाओं में निवास करती हैं।
श्लोक 18
रथः क्षोणी यन्ता शतधृतिरगेन्द्रो धनुरथो
रथाङ्गे चन्द्रार्कौ रथचरणपाणिः शर इति।
अर्थ:
त्रिपुरासुर का संहार करने के लिए पूरी सृष्टि ही शिवजी का रथ बन गई।
श्लोक 19
हरिस्ते सहस्रं कमल बलिमाधाय पदयोः
यदेकोने तस्मिन् निजमुदहरन्नेत्रकमलम्।
अर्थ:
भगवान विष्णु ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए अपना नेत्र अर्पित किया था।
श्लोक 20
क्रतौ सुप्ते जाग्रत्त्वमसि फलयोगे क्रतुमतां
क्व कर्म प्रध्वस्तं फलति पुरुषाराधनमृते।
अर्थ:
भगवान शिव की आराधना के बिना कर्म का फल नहीं मिलता।
श्लोक 21-40 (संक्षेप अर्थ)
इन श्लोकों में भगवान शिव की
-
तांडव शक्ति
-
करुणा
-
विश्वरूप
-
भक्तों पर कृपा
का वर्णन किया गया है।
श्लोक 41
इति स्तुत्वा देवं त्रिभुवनगुरुं पुष्पदन्तः
स्तवं दिव्यं कृत्वा हरिमनुचरः पूजितवता।
अर्थ:
गंधर्व पुष्पदंत ने भगवान शिव की यह स्तुति की।
श्लोक 42
महेशान्नापरो देवो महिम्नो नापरा स्तुतिः।
अर्थ:
भगवान शिव से बड़ा कोई देव नहीं और इस स्तोत्र से श्रेष्ठ कोई स्तुति नहीं।
श्लोक 43
अहरहर्नवद्यं धूर्जटेः स्तोत्रमेतत्
पठति परमभक्त्या शुद्धचित्तः पुमान्यः।
अर्थ:
जो व्यक्ति प्रतिदिन श्रद्धा से इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे शिवजी की कृपा प्राप्त होती है।
शिवमहिम्न स्तोत्र पढ़ने के लाभ
- भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
- जीवन की बाधाएँ और नकारात्मक ऊर्जा दूर होती हैं।
- मन को शांति और आध्यात्मिक शक्ति मिलती है।
- पापों का नाश होता है।
- सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।
शिवमहिम्न स्तोत्र पढ़ने का सही समय
- प्रातःकाल स्नान के बाद
- सोमवार के दिन
- महाशिवरात्रि
- सावन के महीने में
FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)
शिवमहिम्न स्तोत्र किसने लिखा?
शिवमहिम्न स्तोत्र की रचना गंधर्व पुष्पदंत ने की थी।
शिवमहिम्न स्तोत्र पढ़ने से क्या लाभ होता है?
इसका पाठ करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है और जीवन की बाधाएँ दूर होती हैं।
शिवमहिम्न स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?
इसे सुबह या शाम भगवान शिव की पूजा के समय पढ़ना शुभ माना जाता है।


