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🌸 कन्निका परमेश्वरी गायत्री मंत्र
(Kannika Parameshwari Gayatri Mantra)

🕉 कन्निका परमेश्वरी गायत्री मंत्र

” ओम बाला-रूपिणी विद्महे,
श्री परमेश्वरी धीमहि,
थन्नो कन्या प्रचोदयाथ “

“oma baalaa-ruupiṇii vidmahe,
shrii parameshvarii dhiimahi,
thanno kanyaa prachodayaatha “

🌼 कन्निका परमेश्वरी के अन्य मंत्र

“ओम, ह्रीं, श्रीं, क्लीं, आईं, ग्लौं, वं।
श्री वासवि कन्याके मह्यं
सर्व सौभाग्यं देहि देहि स्वाहा।”

🌸 कन्निका परमेश्वरी देवी कौन है ?

कुछ कथाओं के अनुसार आज के आंध्रप्रदेश में लगभग ११वी शताब्दी में विष्णुवर्धन नामक एक चालुक्य राजा शासन करता था जो बहुत ही शक्तिशाली था। इसी समय कुसुमा श्रेष्ठि नाम का एक वैश्य विष्णुवर्धन राजा के आधीन पंडुगोडा में निवास करता था। ... (पूरा text जैसा दिया गया)

📖 कन्निका परमेश्वरी गायत्री मंत्र का अर्थ

हे बालरूपी देवी, हे परमेश्वरी, हमें ज्ञान प्रदान कीजिये । हे कन्या, हमें प्रेरणा प्रदान कीजिये ।

🕯️ कन्निका परमेश्वरी गायत्री मंत्र सामग्री और विधि

  • सामग्री: 108 मोतियों की माला का उपयोग करे।
  • पूजा सामग्री: जल, फूल, चन्दन, कुंकुम, धूप, दीप, नैवेद्य।
  • शुद्धि: शुद्ध रहने के लिए स्नान करके साफ कपडे पहने।
  • आसन: मंत्र का जाप करने के लिए अपनी सुविधा के अनुसार आसन का प्रयोग करे।
  • मंत्र जाप: अपनी आँखें बंद करें और माँ कन्निका परमेश्वरी का ध्यान करें।
  • मंत्र जाप का बार: मंत्र जाप 108 बार करें।
  • ध्यान: मंत्र जाप के दौरान माँ कन्निका परमेश्वरी का ध्यान करें।
  • समापन: मंत्र जाप के बाद, माँ कन्निका परमेश्वरी की आराधना करें और आशीर्वाद मांगें।

🌟 कन्निका परमेश्वरी गायत्री मंत्र के लाभ

  • महिलाओं की शुद्धता और पवित्रता की रक्षा।
  • मासिक धर्म के दर्द और अन्य समस्याओं को दूर करना।
  • ज्ञान और बुद्धि प्रदान करना।
  • भक्ति और समर्पण की भावना बढ़ाना।

🎧 Listen to Mantra

Gita Chalisa गीता चालीसा


गीता चालीसा

Gita Chalisa Hindi poster with Lord Krishna and Arjuna on Kurukshetra chariot scene and Devotional Hub logo.

॥ दोहा ॥
जय गीता माता मइया, जय गीता माता।
जो नर तुमको ध्यावत, नित नव मंगल पाता॥
॥ चौपाई ॥
प्रथमहिं गुरु को शीश नवाऊँ।
हरि चरणों में ध्यान लगाऊँ॥
गीत सुनाऊँ अद्भुत यार।
धारण से हो बेड़ा पार॥
अर्जुन कहै सुनो भगवाना।
अपने रूप बतायो नाना॥
उनका मैं कछु भेद न जाना।
कृपा करि फिर कहो सुजाना॥
जो कोई तुमको नित ध्यावे।
भक्ति भाव से चित्त लगावे॥
रात दिवस तुमरे गुण गावे।
तुमसे दूजा मन न भावे॥
तुमरा नाम जपे दिन रात।
और करे नहीं दूजी बात॥
दूजा निराकार को ध्यावे।
अक्षर अलख अनादि बतावे॥
दोनों ध्यान लगाने वाला।
उनमें कौन उत्तम नंदलाला॥
अर्जुन से बोले भगवान।
सुन प्यारे कछु देकर ध्यान॥
मेरा नाम जपै जपवावे।
नेत्रों में प्रेमाश्रु छावे॥
मुझ बिनु और कछु नहिं चावे।
रात दिवस मेरा गुण गावे॥
सुनकर मेरा नामोच्चार।
उठै रोम तन बारम्बार॥
जिनका क्षण टूटै नहिं तार।
उनकी श्रद्धा अटल अपार॥
मुझ में जुड़कर ध्यान लगावे।
ध्यान समय विह्वल हो जावे॥
कंठ रुके बोला नहिं जावे।
मन बुद्धि मेरे माँहि समावे॥
लज्जा भय अरु बिसरे मान।
अपना रहे न तन का ज्ञान॥
ऐसे जो मन ध्यान लगावे।
सो योगिन में श्रेष्ठ कहावे॥
जो कोई ध्यावे निर्गुण रूप।
पूर्ण ब्रह्म अरु अचल अनूप॥
निराकार सब वेद बतावे।
मन बुद्धि जहाँ थाह न पावे॥
जिसका कबहुँ न होवे नाश।
व्यापक सबमें ज्यों आकाश॥
अटल अनादि आनन्दघन।
जाने बिरला जोगीजन॥
ऐसा करे निरंतर ध्यान।
सबको समझे एक समान॥
मन इन्द्रिय अपने वश राखे।
विषयन के सुख कबहुँ न चाखे॥
सब जीवों के हित में रत।
ऐसा उनका सच्चा मत॥
वह भी मेरे ही को पाते।
निश्चय परम गति को जाते॥
फल दोनों का एक समान।
किन्तु कठिन है निर्गुण ध्यान॥
जबतक है मन में अभिमान।
तबतक होना मुश्किल ज्ञान॥
जिनका है निर्गुण में प्रेम।
उनका दुर्घट साधन नेम॥
मन टिकने को नहीं अधार।
इससे साधन कठिन अपार॥
सगुण ब्रह्म का सुगम उपाय।
सो मैं तुझको दिया बताय॥
यज्ञ दानादि कर्म अपारा।
मेरे अर्पण कर कर सारा॥
अटल लगावे मेरा ध्यान।
समझे मुझको प्राण समान॥
सब दुनिया से तोड़े प्रीत।
मुझको समझे अपना मीत॥
प्रेम मग्न हो अति अपार।
समझे यह संसार असार॥
जिसका मन नित मुझमें यार।
उनसे करता मैं अति प्यार॥
केवट बनकर नाव चलाऊँ।
भव सागर के पार लगाऊँ॥
यह है सबसे उत्तम ज्ञान।
इससे तू कर मेरा ध्यान॥
फिर होवेगा मोहिं समान।
यह कहना मम सच्चा जान॥
जो चाले इसके अनुसार।
वह भी हो भवसागर पार॥
॥ दोहा ॥
गीता जी के पाठ से, सब संकट हो दूर।
भक्ति भाव से जो पढ़े, पावै मोक्ष जरूर॥


॥ Chaupai ॥

Pratham hi guruko sheesh navaun,
Hari charanon mein dhyaan lagaun.

Geet sunaun adbhut yaar,
Dhaaran se ho beda paar.

Arjun kahai suno Bhagwana,
Apne roop bataye nana.

Unka main kachu bhed na jaana,
Kirpa kar phir kaho sujana.

Jo koi tumko nit dhyaave,
Bhakti bhaav se chitt lagaave.

Raat divas tumre gun gaave,
Tumse dooja man nahin bhaave.

Tumra naam jape din raat,
Aur kare nahin dooji baat.

Dooja nirakar ko dhyaave,
Akshar alakh anaadi bataave.

Dono dhyaan lagaane wala,
Unmein kaun uttam Nandlala.

Arjun se bole Bhagwan,
Sun pyaare kachu dekar dhyaan.

Mera naam japai japavaave,
Netron mein premashru chhaave.

Mujh bin aur kachu nahin chaave,
Raat divas mera gun gaave.

Sunkar mera naamochchaar,
Uthai rom tan baarambaar.

Jinka kshan tootai nahin taar,
Unki shraddha atal apaar.

Mujh mein judkar dhyaan lagaave,
Dhyaan samay vihval ho jaave.

Kanth ruke bola nahin jaave,
Man buddhi mere maahi samaave.

Lajja bhay aru bisare maan,
Apna rahe na tan ka gyaan.

Aise jo man dhyaan lagaave,
So yogin mein shreshth kahaave.

Jo koi dhyaave nirgun roop,
Poorn brahm aru achal anoop.

Nirakar sab ved bataave,
Man buddhi jahan thaah na paave.

Jiska kabhun na hove naash,
Byaapak sabmein jyon aakaash.

Atal anaadi anandghan,
Jaane birla jogijan.

Aisa kare nirantar dhyaan,
Sabko samjhe ek samaan.

Man indriya apne vash raakhe,
Vishayon ke sukh kabhun na chaakhe.

Sab jeevon ke hit mein rat,
Aisa unka sachcha mat.

Wah bhi mere hi ko paate,
Nishchay parama gati ko jaate.

Phal dono ka ek samaan,
Kintu kathin hai nirgun dhyaan.

Jabtak hai man mein abhimaan,
Tabtak hona mushkil gyaan.

Jinka hai nirgun mein prem,
Unka durghat saadhan nem.

Man tikne ko nahin adhaar,
Isse saadhan kathin apaar.

Sagun brahm ka sugam upaay,
So main tujhko diya bataay.

Yagya daanadi karm apaara,
Mere arpan kar kar saara.

Atal lagaave mera dhyaan,
Samjhe mujhko praan samaan.

Sab duniya se tode preet,
Mujhko samjhe apna meet.

Prem magn ho ati apaar,
Samjhe yeh sansaar asaar.

Jiska man nit mujh mein yaar,
Unse karta main ati pyaar.

Kevat bankar naav chalaun,
Bhav saagar ke paar lagaun.

Yeh hai sabse uttam gyaan,
Isse tu kar mera dhyaan.

Phir hovega mohi samaan,
Yeh kehna mam sachcha jaan.

Jo chaale iske anusaar,
Wah bhi ho bhavsagar paar.





























































Ashadha Purnima कब हैं आषाढ़ पूर्णिमा 2025?

कब हैं आषाढ़ पूर्णिमा 2025? जानें गोपद्म व्रत व पूजा की विधि



कब हैं आषाढ़ पूर्णिमा 2025? जानें गोपद्म व्रत व पूजा की विधिवैसे तो प्रत्येक माह की पूर्णिमा तिथि धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण होती है लेकिन आषाढ़ माह की पूर्णिमा और भी खास होती है। आषाढ़ पूर्णिमा (Ashaad Purnima) को ही गुरु पूर्णिमा के रूप में भी मनाया जाता है साथ ही इस दिन गोपद्म व्रत भी रखा जाता है। इस पूर्णिमा को भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। आइये जानते हैं आषाढ़ पूर्णिमा के महत्व व व्रत विधि के बारे में।

कब है आषाढ़ पूर्णिमा 2025 व गोपद्म व्रत


साल 2025 में आषाढ़ पूर्णिमा की तिथि 10 जुलाई 2025 है।

जुलाई 10, 2025, बृहस्पतिवार (आषाढ़ पूर्णिमा व्रत)

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - 10 जुलाई, रात 01:36 बजे से

पूर्णिमा तिथि समाप्त - 11 जुलाई, रात 02:06 बजे तक

आषाढ़ पूर्णिमा का महत्व


हिंदूओं में पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार प्रत्येक माह का नामकरण पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा जिस नक्षत्र में विद्यमान होता है उसी के अनुसार रखा गया है। मान्यता है कि आषाढ़ माह की पूर्णिमा को चंद्रमा पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में होता है। यदि आषाढ़ मास में पूर्णिमा तिथि को चंद्रमा उत्ताराषाढ़ा नक्षत्र में रहे तो वह पूर्णिमा बहुत ही सौभाग्यशाली व पुण्य फलदायी मानी जाती है। ऐसे संयोग में दस विश्वदेवों की पूजा करने का विधान भी है।

आषाढ़ पूर्णिमा व गुरु पूर्णिमा


आषाढ़ मास की पूर्णमासी को ही गुरु पूर्णिमा भी मनाई जाती है। आषाढ़ में गुरु पूर्णिमा मनाये जाने को ओशो ने अच्छे से व्याख्यायित किया है उनका मानना है कि जिसने भी गुरु पूर्णिमा को आषाढ़ मास में चुना है इसके पिछे उसका कोई खयाल है कोई ईशारा है। क्योंकि आषाढ़ पूर्णिमा तो पूर्णिमा सी नज़र भी नहीं आती उससे सुंदर और भी पूर्णिमाएं हैं शरद पूर्णिमा है जिसका चांद बहुत सुंदर होता है लेकिन नहीं उसे नहीं चुना। इसका कारण यह है कि गुरु तो पूर्णिमा जैसा है और शिष्य है आषाढ़ जैसा। आषाढ़ में चंद्रमा बादलों से घिरा रहता है। यानि गुरु शिष्यों से घिरा है। शरद पूर्णिमा पर अकेला चांद चमकता नज़र आता है वहां गुरु ही है शिष्य है ही नहीं। जन्म-जन्मांतर के अज्ञान रूपी अंधकार स्वरूपी बादल ही शिष्य हैं जिनमें गुरु चांद की तरह अपनी चमक से अंधेरे वातावरण को चिर कर उसमें रोशनी पैदा करता है। इसलिये आषाढ़ पूर्णिमा में ही गुरु पूर्णिमा की सार्थकता है।

आषाढ़ पूर्णिमा पर गोपद्म व्रत

आषाढ़ मास की पूर्णिमा तिथि को ही गोपद्म व्रत भी रखा जाता है। इस व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। मान्यता है कि गोपद्म व्रत सभी प्रकार के सुख प्रदान करने वाला होता है।

आषाढ़ पूर्णिमा व गोपद्म व्रत पूजा की विधि


हिंदूओं के विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में विभिन्न पर्व-त्योहारों व व्रतों पर विशेष पूजा करने के विधान हैं।


शास्त्रानुसार आषाढ़ पूर्णिमा पर रखे जाने वाले गोपद्म व्रत की विशेष विधि है।


गोपद्म व्रत में भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। हालांकि देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार मास तक के लिये सो जाते हैं लेकिन गोपद्म व्रत के दिन उन्हीं की पूजा की जाती है।


इसके लिये व्रती को प्रात:काल उठकर स्नानादि के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिये।


व्रत के पूरे दिन भगवान श्री विष्णु में ध्यान लगाये रखना चाहिये।


उनके चतुर्भुज रूप का स्मरण करना चाहिये जिसमें वे गरूड़ पर सवार हों और संग में माता लक्ष्मी का भी ध्यान लगाना चाहिये।


समस्त देवी-देवता उनका स्तुतिगान कर रहे हैं उनकी आराधना कर रहे हैं ऐसा सोचना चाहिये।


धूप, दीप, पुष्प, गंध आदि से विधिनुसार पूजा करनी चाहिये।


भगवान श्री हरि के पूजन के पश्चात विद्वान ब्राह्मण या किसी जरूरदमंद को भोजन करवाकर सामर्थ्यनुसार दान-दक्षिणा देकर प्रसन्न करना चाहिये।

मान्यता है कि यदि पूरी श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन किया जाये तो इससे भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं एवं व्रती की मनोकामना को पूर्ण करते हैं। संसार में रहते समस्त भौतिक सुखों का आनंद लेकर अंत काल में व्रती को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Phalgun Purnima फाल्गुन पूर्णिमा 2025 फाल्गुन पूर्णिमा 2025 - कब है फाल्गुन पूर्णिमा?

 फाल्गुन पूर्णिमा 2025 - कब है फाल्गुन पूर्णिमा? जानें इसका शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा




फागुन जहां हिन्दू वर्ष का अंतिम महीना होता है तो फागुन पूर्णिमा वर्ष की अंतिम पूर्णिमा के साथ-साथ वर्ष का अंतिम दिन भी होती है। फागुन पूर्णिमा का धार्मिक रूप से तो महत्व है ही साथ ही सामाजिक-सांस्कृतिक नजरिये से भी बहुत महत्व है। पूर्णिमा पर उपवास भी किया जाता है जो सूर्योदय से आरंभ कर चंद्रोदय तक रखा जाता है। वहीं इस त्यौहार की सबसे खास बात यह है कि यह दिन होली पर्व का दिन होता है जिसे बुराई पर अच्छाई की विजय के रूप में मनाया जाता है और तमाम लकड़ियों को इकट्ठा कर सभी प्रकार की नकारात्मकताओं की होली जलाई जाती है।


2025 में कब है फाल्गुन पूर्णिमा (Falgun Purnima 2025)

2025 में फागुन पूर्णिमा व्रत 13 मार्च को रखा जायेगा। इसी दिन होलिका का दहन भी किया जायेगा। इस फागुन पूर्णिमा के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-

मार्च 14, 2025, शुक्रवार (फाल्गुन पूर्णिमा, पूर्णिमा)

पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ - 13 मार्च, सुबह 10:35 बजे से

पूर्णिमा तिथि समाप्त - 14 मार्च, दोपहर 12:23 बजे तक

क्या है फाल्गुन पूर्णिमा व्रत (Falgun Purnima Vrat) की विधि


मान्यता है कि फागुनी पूर्णिमा पर व्रत करने से व्रती के सारे संताप मिट जाते हैं सभी कष्टों का निवारण हो जाता है व श्रद्धालु पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा होती है। व्रती को पूर्णिमा के दिन सूर्योदय से लेकर चंद्रोदय यानि चंद्रमा दिखाई देने तक उपवास रखना चाहिये। प्रत्येक मास की पूर्णिमा में उपवास व पूजा करने की भिन्न भिन्न विधियां हैं।

फाल्गुनी पूर्णिमा पर कामवासना का दाह किया जाता है ताकि निष्काम प्रेम के भाव से प्रेम का रंगीला पर्व होली मनाया जा सके। फागुन मास की पूर्णिमा बहुत ही महत्वपूर्ण होती है इसलिये हमारी राय है कि आपको विद्वान ज्योतिषाचार्यों से परामर्श अवश्य करना चाहिये।

फाल्गुन पूर्णिमा की पूजा विधि (Falgun Purnima Puja Vidhi)


फाल्गुन पूर्णिमा के दिन ही होलिका दहन का पूजन किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु के चौथे अवतार भगवान नरसिंह की पूजा की जाती है।


पूर्णिमा के दिन प्रातकाल उठकर स्नानादि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके होलिका का पूजन करना चाहिए।


होलिका दहन से पूर्व अपने आसपास पानी की कुछ बूंदे अवश्य छिड़कें। इसके बाद गाय के गोबर से होलिका का निर्माण करें।


एक थाली में माला, रोली, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल, पांच प्रकार के अनाज में गेहूं की बालियां और साथ में एक लोटा जल अवश्य रखें।


पूजा सामग्री के बाद भगवान नरसिंह की प्रार्थना करें और होलिका पर रोली, अक्षत, फूल, बताशे अर्पित करें और मौली को होलिका के चारों ओर लपेटें।


तत्पश्चात होलिका पर प्रह्लाद का नाम लेकर पुष्प अर्पित करें। भगवान नरसिंह का नाम लेते हुए 5 अनाज चढ़ाएं।


पूजा संपन्न होने के बाद होलिका दहन करें और उसकी परिक्रमा करना ना भूलें।


होलिका की अग्नि में गुलाल डालें और घर के बुजुर्गों के पैरों पर गुलाल लगाकर आशीर्वाद लें।
 
फाल्गुन पूर्णिमा व्रत की कथा (Falgun Purnima Vrat Katha)


फागुन पूर्णिमा के व्रत की वैसे तो अनेक कथाएं हैं लेकिन नारद पुराण में जो कथा दी गई है वह असुर राज हरिण्यकश्यपु की बहन राक्षसी होलिका के दहन की कथा है जो भगवान विष्णु के भक्त व हरिण्यकश्यपु के पुत्र प्रह्लाद को जलाने के लिये अग्नि स्नान करने बैठी थी लेकिन प्रभु की कृपा से होलिका स्वयं ही अग्नि में भस्म हो जाती है। इस प्रकार मान्यता है कि इस दिन लकड़ियों, उपलों आदि को इकट्ठा कर होलिका का निर्माण करना चाहिये व मंत्रोच्चार के साथ शुभ मुहूर्त में विधिपूर्वक होलिका दहन करना चाहिये। जब होलिका की अग्नि तेज होने लगे तो उसकी परिक्रमा करते हुए खुशी का उत्सव मनाना चाहिये और होलिका दहन के साथ भगवान विष्णु व भक्त प्रह्लाद का स्मरण करना चाहिये। असल में होलिका अहंकार व पापकर्मों की प्रतीक भी है इसलिये होलिका में अपने अंहकार व पापकर्मों की आहुति देकर अपने मन को भक्त प्रह्लाद की तरह भगवान के प्रति समर्पित करना चाहिये।